वास्तु शास्त्र के अनुसार, बरामदा घर की 'त्वचा' की तरह होता है। यह घर के भीतर की निजी ऊर्जा और बाहरी सार्वजनिक ऊर्जा के बीच संतुलन बनाता है। एक अच्छी तरह से निर्मित बरामदा घर में प्रवेश करने वाले मेहमानों और निवासियों के मन में शांति का संचार करता है। इसे 'अलिंद' भी कहा जाता है।
यदि बरामदा वास्तु के नियमों के विरुद्ध है, तो यह घर में अनावश्यक तनाव और बाहरी बाधाओं को आमंत्रण दे सकता है। बरामदा हमेशा मुख्य भवन की ऊंचाई से थोड़ा कम ऊंचा होना चाहिए।
बरामदे के लिए उत्तर (North) और पूर्व (East) दिशाएं सर्वोत्तम मानी गई हैं।
बरामदे के फर्श की ऊंचाई घर के मुख्य फर्श (Plinth level) से थोड़ी नीचे होनी चाहिए। इसकी ढलान हमेशा उत्तर-पूर्व (ईशान) की ओर होनी चाहिए ताकि वर्षा का जल उसी दिशा में प्रवाहित हो। यह सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को सुनिश्चित करता है।
बरामदे में खंभों (Pillars) का उपयोग करते समय उनकी संख्या का ध्यान रखें। खंभों की संख्या सम (Even) होनी चाहिए जैसे 2, 4, 6 या 8। खंभे कभी भी मुख्य द्वार के ठीक सामने नहीं होने चाहिए, क्योंकि यह 'स्तंभ वेध' दोष उत्पन्न करता है, जो प्रगति में बाधा डालता है।
बरामदे में यदि सोफा या बैठने की बेंच रखनी है, तो उसे दक्षिण या पश्चिम की दीवारों के पास रखें। उत्तर या पूर्व की दिशा को खाली और हल्का छोड़ना चाहिए। यहाँ भारी झूला लगाना है तो वह उत्तर-पश्चिम या दक्षिण दिशा में बेहतर होता है।
अक्सर लोग बरामदे में ही जूते उतारते हैं। वास्तु के अनुसार, जूते रखने का रैक (Shoe Rack) कभी भी बरामदे के उत्तर या पूर्व कोने में नहीं होना चाहिए। इसे हमेशा पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम दिशा में व्यवस्थित करके रखना चाहिए। गंदे जूते बरामदे की ऊर्जा को दूषित करते हैं।
बरामदे के लिए हल्के रंगों का चुनाव करें जैसे क्रीम, हल्का पीला या सफेद। ये रंग रोशनी को परावर्तित करते हैं और वातावरण को सकारात्मक बनाते हैं। गहरे लाल या काले रंगों से यहाँ बचना चाहिए।
बरामदे की दीवारों पर प्राकृतिक दृश्य, फूलों के चित्र या दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर (यदि दिशा पश्चिम है) लगाई जा सकती है। बरामदे के कोने में एक छोटा सा मनी प्लांट या शांति देने वाले छोटे पौधे रखना घर में शांति और समृद्धि को बढ़ाता है।