वास्तु शास्त्र के अनुसार, विवाह स्थल के लिए भूमि का चयन सबसे महत्वपूर्ण है। वर्गाकार या आयताकार भूमि सबसे शुभ मानी जाती है। शेरमुखी (आगे से चौड़ी और पीछे से संकरी) भूमि का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, लेकिन इसका मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए। भूमि का ढलान उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए, जो समृद्धि और खुशहाली सुनिश्चित करता है।
मैरिज गार्डन का मुख्य द्वार हमेशा उत्तर (N), उत्तर-पूर्व (NE - ईशान) या पूर्व (E) दिशा में होना चाहिए। यह मेहमानों के लिए सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश सुनिश्चित करता है। दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम (SW) दिशा में मुख्य द्वार बनाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कानूनी विवाद या दुर्घटनाओं की संभावना बनी रहती है। द्वार भव्य और कलात्मक होना चाहिए।
विवाह की रस्में निभाने के लिए मंडप उत्तर-पूर्व (NE) या पूर्व दिशा में बनाया जाना चाहिए। हवन कुंड मंडप के दक्षिण-पूर्व (SE - आग्नेय) कोण में होना चाहिए। मंडप के ऊपर कोई बीम नहीं होना चाहिए। दूल्हा और दुल्हन का मुख विवाह के समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
रसोई घर या कैटरिंग का क्षेत्र हमेशा दक्षिण-पूर्व (SE - आग्नेय कोण) में स्थित होना चाहिए। अग्नि का स्थान इसी दिशा में होने से भोजन स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक बनता है। भोजन परोसने का स्थान (Buffet) पश्चिम (W) या उत्तर-पश्चिम (NW - वायव्य) दिशा में रखा जा सकता है। पानी के भंडारण के लिए उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा का उपयोग करें।
मेहमानों के लिए कमरे दक्षिण (S) या पश्चिम (W) दिशा में बनाने चाहिए। दूल्हे और दुल्हन के चेंजिंग रूम के लिए दक्षिण-पश्चिम (SW) दिशा उत्तम है क्योंकि यह स्थिरता प्रदान करती है। खिड़कियां उत्तर या पूर्व की ओर होनी चाहिए।
मैरिज गार्डन में वाहनों की पार्किंग उत्तर-पश्चिम (NW) या दक्षिण-पूर्व (SE) दिशा में की जानी चाहिए। उत्तर-पूर्व (NE) कोने को पार्किंग के लिए उपयोग न करें क्योंकि यह कोना हल्का और साफ रहना चाहिए।
शौचालय हमेशा उत्तर-पश्चिम (NW) या दक्षिण (S) दिशा में होने चाहिए। उत्तर-पूर्व (ईशान) कोने में कभी भी शौचालय न बनाएं। सेप्टिक टैंक भी पश्चिम या उत्तर-पश्चिम में ही होना चाहिए।
प्रकाश व्यवस्था के लिए दक्षिण-पूर्व (SE) दिशा का उपयोग करें। उत्तर-पूर्व में फव्वारे या जल निकाय (Water bodies) लगाए जा सकते हैं, जो शांति और सुंदरता बढ़ाते हैं। गार्डन के बीच का हिस्सा (ब्रह्मस्थान) खुला और खाली होना चाहिए।
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