किसी भी व्यवसाय की सफलता केवल उसकी सेवाओं और गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस स्थान की ऊर्जा और वास्तु पर भी टिकी होती है। होटल और रेस्टोरेंट उद्योग में, जहाँ ग्राहकों का आना-जाना निरंतर लगा रहता है, वहाँ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह अत्यंत महत्वपूर्ण है। VASTU VIKAS के इस विशेष खंड में हम जानेंगे कि होटल को वास्तु सम्मत कैसे बनाया जाए।
होटल के लिए भूमि का चयन करते समय यह ध्यान रखें कि जमीन का आकार वर्गाकार या आयताकार हो। 'शेरमुखी' जमीन (सामने से चौड़ी और पीछे से संकरी) व्यावसायिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है।
होटल का मुख्य द्वार उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में होना सबसे उत्तम है। यह दिशा ग्राहकों को आकर्षित करने और समृद्धि लाने के लिए जानी जाती है। मुख्य द्वार के पास कोई भी भारी खंभा या गड्ढा नहीं होना चाहिए।
रिसेप्शन डेस्क को होटल के उत्तर या पूर्व क्षेत्र में स्थापित करना चाहिए। रिसेप्शनिस्ट का मुख उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए। लॉबी क्षेत्र को खुला और प्रकाशमान रखें। ईशान कोण (NE) में भगवान गणेश या वास्तु पुरुष की मूर्ति स्थापित करना शुभ होता है।
होटल या रेस्टोरेंट का किचन हमेशा आग्नेय कोण (South-East) में होना चाहिए। खाना बनाते समय रसोइए का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। सिंक और नल को किचन के उत्तर-पूर्व हिस्से में रखें, क्योंकि अग्नि और जल का संतुलन वास्तु का मूल आधार है।
ग्राहकों के बैठने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि उनका मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो। भारी फर्नीचर को डाइनिंग हॉल के दक्षिण या पश्चिम भाग में रखना चाहिए। दीवारों पर हल्के और भूख बढ़ाने वाले रंगों (जैसे क्रीम, हल्का पीला या नारंगी) का प्रयोग करें।
होटल के कमरे दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) से उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) की ओर फैले होने चाहिए। वीआईपी कमरे हमेशा दक्षिण-पश्चिम दिशा में होने चाहिए। कमरों में बेड का सिरहाना दक्षिण या पूर्व की ओर होना चाहिए।
शौचालय के लिए सबसे उपयुक्त स्थान उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) या दक्षिण-पश्चिम है। जल निकासी की व्यवस्था उत्तर या पूर्व की ओर होनी चाहिए। कभी भी ईशान कोण (NE) में टॉयलेट न बनाएं, इससे भारी आर्थिक हानि हो सकती है।
भारी बिजली के उपकरण, जनरेटर और ट्रांसफार्मर हमेशा दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में रखे जाने चाहिए। यह अग्नि की दिशा है और विद्युत उपकरणों के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती है।
यदि होटल में गार्डन है, तो फव्वारे या जल कुंड उत्तर या पूर्व दिशा में होने चाहिए। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार, होटल का केंद्र (ब्रह्मस्थान) हमेशा खाली और साफ होना चाहिए। यहाँ किसी भी प्रकार का निर्माण या भारी फर्नीचर नहीं होना चाहिए। रेस्टोरेंट में संगीत की ध्वनि मधुर होनी चाहिए और इसे उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित करना चाहिए।
कर्मचारियों का व्यवहार और उनकी ऊर्जा भी वास्तु से प्रभावित होती है। उनके रहने का स्थान (Staff Quarter) उत्तर-पश्चिम दिशा में होना चाहिए ताकि वे सक्रिय और खुश रहें।