प्राचीन भारतीय वास्तुकला में आंगन को घर का 'हृदय' या 'नाभि' माना गया है। वास्तु पुरुष मंडल के अनुसार, घर का मध्य भाग 'ब्रह्मस्थान' होता है, जिसे खुला रखना अनिवार्य है। आंगन वह स्थान है जहाँ से आकाश तत्व (Space Element) का सीधा संपर्क घर के अन्य हिस्सों से होता है।
यदि घर में आंगन नहीं है या वह भारी निर्माण से दबा हुआ है, तो घर के सदस्यों का स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्रभावित हो सकती है। आंगन प्राकृतिक प्रकाश और ताजी हवा का मुख्य स्रोत होता है, जो वैज्ञानिक रूप से भी घर के वातावरण को कीटाणुमुक्त रखने में मदद करता है।
आंगन हमेशा घर के केंद्र में या थोड़ा उत्तर-पूर्व की ओर खिसका हुआ होना चाहिए। यहाँ किसी भी प्रकार का भारी खंभा, दीवार, बीम या सीढ़ी का होना सख्त मना है। इसे 'ब्रह्मपद' कहा जाता है, और यहाँ दोष होने पर वंश वृद्धि में बाधा और आर्थिक हानि की संभावना रहती है।
आंगन के फर्श की ढलान हमेशा उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान) की ओर होनी चाहिए। यदि आंगन का पानी दक्षिण या पश्चिम की ओर बहता है, तो यह घर के संचित धन के व्यय होने का कारण बनता है। पानी का निकास ईशान कोण से होना सौभाग्यकारी माना जाता है।
आंगन के ठीक मध्य में या उत्तर-पूर्व दिशा में 'तुलसी चौरा' बनाना अत्यंत शुभ है। तुलसी का पौधा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह ओजोन गैस का उत्सर्जन करके वातावरण को शुद्ध करता है। आंगन में कांटेदार या दूध निकलने वाले पौधे कभी नहीं लगाने चाहिए।
आंगन का उपयोग सत्संग, कीर्तन, बच्चों के खेलने या अनाज सुखाने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यहाँ कभी भी कूड़ा-करकट, पुराने जूते-चप्पल या भारी मशीनरी नहीं रखनी चाहिए। आंगन में शौचालय या रसोई का निर्माण ब्रह्मस्थान को दूषित करता है, जिससे असाध्य बीमारियां हो सकती हैं।
आंगन के फर्श के लिए सफेद संगमरमर, हल्के पीले पत्थर या प्राकृतिक मिट्टी के रंगों वाली टाइल्स का प्रयोग करना चाहिए। गहरे रंगों जैसे काला या गहरा नीला रंग यहाँ की सकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है, इसलिए इनसे बचना चाहिए।
आजकल सुरक्षा के लिए आंगन के ऊपर लोहे का जाल लगाया जाता है। ध्यान रहे कि यह जाल बहुत भारी न हो और इसमें जंग न लगा हो। यदि संभव हो तो इस पर पारदर्शी कांच या फाइबर शीट लगाई जा सकती है ताकि सूर्य की किरणें सीधे ब्रह्मस्थान पर पड़ें।
यदि आंगन छोटा है या दबा हुआ है, तो वहाँ की दीवारों पर दर्पण लगाकर विस्तार का आभास कराया जा सकता है। आंगन की उत्तर-पूर्व दीवार पर उगते हुए सूरज की तस्वीर या बहते हुए पानी का चित्र लगाने से सकारात्मकता बढ़ती है। रात के समय आंगन में एक मध्यम रोशनी का बल्ब जलता रहना चाहिए।